आती हूँ तेरे दर पर हमेशा कोई मुराद लेकर,
की ये कर दे मेरे लिए,
मुझे ये बना दे, वो दिला दे,
की मेरी हर सांस जैसे तुझसे मांगने के लिए बानी हो।
मेरी मंज़िल यही होगी,
एक दिन मैं तेरे पास आऊं,
न कोई मुराद न फरियाद लेकर,
बस बैठी रहूँ तेरे पास बिना झोली फैलाय।
आखिर बिन बोले- बोल ही दिया, बिन मांगे मांग लिया;
‘न मांगने’ की कसमें खाते-खाते,
‘न माँगना’ भी तुझ से ही मांग लिया।
